संगीत

भारतमे संगीत: एकटा जीवंत परिदृश्य

भारतक संगीत कोनो एकटा परम्परा नहि, बल्कि भाषा, क्षेत्र, आस्था, समुदाय, संरक्षण, प्रस्तुति आ तकनीक सँ आकार लेल विशाल आ परस्पर जुड़ल ध्वनि-जगत अछि। ई शास्त्रीय संगीत समारोह आ गामक जुटान, मन्दिर आ दरगाह, पर्व आ पारिवारिक संस्कार, नाटक आ नृत्य, सिनेमा आ डिजिटल मंच सभमे सुनाइ पड़ैत अछि। हिन्दुस्तानी आ कर्नाटक संगीत राग, ताल, रचना आ तत्क्षण विस्तारक अत्यन्त विकसित पद्धति बनौलक अछि, जखन कि क्षेत्रीय, लोक, जनजातीय, भक्तिमूलक आ लोकप्रिय परम्परा गायन, वादन, कथा स्मरण आ जीवनक महत्वपूर्ण अवसरकेँ चिह्नित करबाक अपन-अपन तरीका बचौने अछि।

एक नजरिमे

भारतीय संगीतकेँ बुझबाक उपयोगी तरीका ई अछि जे कोनो एकटा शैलीकेँ पूरा देशक प्रतिनिधि नहि मानि, एकरे अनेक परतकेँ एकसाथ देखल जाए।

  • हिन्दुस्तानी आ कर्नाटक संगीत दूटा प्रमुख शास्त्रीय प्रणाली अछि।
  • क्षेत्रीय, लोक, जनजातीय आ सामुदायिक परम्परा संगीतकेँ स्थान, भाषा, जीविका, अनुष्ठान, ऋतु आ उत्सव सँ जोड़ैत अछि।
  • स्वर, श्रुति, राग, ताल आ लय शास्त्रीय संगीत-चिन्तनक महत्वपूर्ण अवधारणा अछि, मुदा अलग-अलग परम्परामे एकर अभिव्यक्ति अलग होइत अछि।
  • स्वरलिपि, रिकॉर्डिंग आ औपचारिक संस्थाक उपयोग होइत रहितो सीखब आइयो बहुत हद तक सुनब, अनुकरण, स्मृति आ लगातार अभ्यास पर निर्भर अछि।
  • फिल्मी, सुगम, स्वतंत्र आ समकालीन संगीत पुरान रचनाभण्डार, वाद्य आ क्षेत्रीय संगीत-भाषा सँ निरन्तर संवाद करैत अछि।
गर्म मंचीय प्रकाशमे कन्सर्ट मंच पर तबला बजबैत कलाकार
जीवंत प्रस्तुति भारतीय लयात्मक परम्पराकेँ समकालीन संगीत-मंच धरि अनैत रहैत अछि।

क्षेत्रीय संगीत

देखू जे भाषा, भूगोल, समुदाय, पर्व आ रोजमर्रा जीवन भारतक अलग-अलग संगीत परम्पराकेँ कोना आकार दैत अछि।

हिन्दुस्तानी संगीत

राग, ताल, रचना, तत्क्षण विस्तार आ प्रमुख गायन-वादन रूपक माध्यम सँ उत्तर भारतीय शास्त्रीय परम्पराकेँ बुझू।

कर्नाटक संगीत

दक्षिण भारतीय शास्त्रीय परम्परा, एकर रचना-समृद्ध भण्डार, तालक गहराइ आ तत्क्षण विस्तारक पद्धतिकेँ जानू।

भारतक वाद्ययंत्र

जानू जे तार, वायु, झिल्ली आ घन वाद्य धुन, ताल, आधार-नाद, अनुनाद आ ध्वनि-रंगमे कोना योगदान करैत अछि।

मूल आधार: स्वर, श्रुति, राग, ताल आ लय

भारतीय शास्त्रीय संगीतक परिचय प्रायः किछु परस्पर जुड़ल अवधारणासँ कराओल जाइत अछि। स्वर संगीतक एकटा नोट अथवा ओकर कार्यकेँ कहैत अछि; श्रुति सुनाइ पड़ैत सूक्ष्म पिच-पार्थक्य आ पिचक सैद्धान्तिक व्यवस्था सँ जुड़ल आरो सूक्ष्म अवधारणा अछि। राग केवल स्केल नहि अछि। ई विशिष्ट गति, महत्वपूर्ण स्वर, वाक्यांश, अलंकार आ प्रस्तुति सँ उभरैत अपन पहिचान वाला सुमधुर ढाँचा अछि। ताल दोहराइत लय-चक्र सँ संगीतक समय व्यवस्थित करैत अछि, जखन कि लय सामान्य रूपेँ गति, चाल आ संगीत-समयक प्रवाहकेँ बुझबैत अछि।

  • सा स्वर-सन्दर्भक मूल बिन्दु बनैत अछि। कलाकार वा वाद्यक सुविधा अनुसार ओकर वास्तविक पिच चुनल जा सकैत अछि।
  • रागक पहिचान केवल अनुमत स्वरसभक समूह सँ नहि, बल्कि ओकर विशिष्ट चाल आ वाक्य-विन्यास सँ बनैत अछि।
  • ताल चक्रीय अछि: मात्रासभ दोहराइत ढाँचामे समूहित होइत अछि आ भीतरक विभाग कलाकारकेँ रचना आ तत्क्षण विस्तार व्यवस्थित करबामे मदद करैत अछि।
  • रूप आ प्रस्तुति अनुसार लय स्थिर रहि सकैत अछि अथवा जटिल लयात्मक विकासक क्षेत्र बनि सकैत अछि।
  • अलंकरण आ स्वरसभक बीच लगातार गति अनेक शैलीक केन्द्रमे अछि, तेँ केवल लिखल नोटक सूची सँ पूरा ध्वनि नहि पकड़ल जा सकैत अछि।

शास्त्रीय परम्परा: हिन्दुस्तानी आ कर्नाटक

हिन्दुस्तानी आ कर्नाटक संगीत स्वर, राग आ तालक पुरान भारतीय अवधारणासभ साझा करैत अछि, मुदा अनेक शताब्दीमे अलग रचनाभण्डार, प्रस्तुति-व्याकरण, शिक्षण-परम्परा आ कन्सर्ट-रिवाज विकसित केलक अछि। हिन्दुस्तानी संगीतक ऐतिहासिक केन्द्र उत्तर, पश्चिम आ पूर्व भारतमे अछि; कर्नाटक संगीतक गहिर ऐतिहासिक जड़ि दक्षिण भारतमे अछि। आइ दुनू परम्परा भारत आ विदेशमे अपन क्षेत्रीय केन्द्र सँ बहुत दूर धरि सिखाओल आ प्रस्तुत कएल जाइत अछि।

पहलूहिन्दुस्तानी परम्पराकर्नाटक परम्परा
ऐतिहासिक केन्द्रउत्तर, पश्चिम आ पूर्व भारतदक्षिण भारत
कन्सर्टक तरीकाप्रायः धीरे-धीरे राग-विकास, रचना आ तत्क्षण विस्तारकेँ लम्बा समय दैत अछिप्रायः विशाल रचित भण्डारक संग विस्तृत सुरात्मक आ लयात्मक तत्क्षण विस्तार रहैत अछि
प्रचलित गायन रूपध्रुपद, खयाल, ठुमरी आ अन्य रूपवर्णम, कृति, रागम-तानम-पल्लवी आ अन्य रूप
बहुधा सुनल जाएवाला वाद्यसितार, सरोद, सारंगी, बाँसुरी, शहनाइ, तबला, पखावज, तानपुरावीणा, वायलिन, बाँसुरी, नादस्वरम, मृदंगम, घटम, कंजीरा, तानपुरा
परम्पराक संचरणमौखिक परम्परा, व्यक्तिगत गुरु आ घराना परम्पराक संग संस्थामौखिक परम्परा आ गुरु-केंद्रित शिक्षणक संग संस्था आ कन्सर्ट संगठन

ई भेद दिशा बुझबाक लेल उपयोगी अछि, मुदा एकरा कठोर सीमा नहि मानल जएबाक चाही। संगीतकार, वाद्य आ विचार क्षेत्रसभक पार गेल अछि। किछु क्षेत्र दुनू परम्पराकेँ जीवित रखैत अछि, आ उत्सव, विश्वविद्यालय, रिकॉर्डिंग आ सहयोगी काजक माध्यम सँ कलाकार एक-दोसरक रचनाभण्डारसँ बेसी परिचित भऽ रहल छथि। दुनू प्रणालीकेँ भारतक बहुत पैघ संगीत-जगतक भीतर सम्बन्धित, मुदा स्वतंत्र रूपेँ विकसित शास्त्रीय परम्परा मानब उत्तम अछि।

लोक, जनजातीय, क्षेत्रीय आ सामुदायिक संगीत

बहुत लोकक लेल संगीतक पहिल अनुभव कन्सर्टक श्रेणी सँ नहि, परिवार आ समुदाय सँ होइत अछि। जन्म-विवाह, बीया रोपब आ फसल काटब, यात्रा आ काज, ऋतुक पर्व, पूजा, कथा-कहानी, स्थानीय नाटक आ सामूहिक उत्सवमे गीत जुड़ल रहैत अछि। लोक आ जनजातीय परम्परा शास्त्रीय संगीतक सरल रूप नहि अछि; ओकर अपन सौन्दर्यबोध, रचनाभण्डार, प्रस्तुति-पद्धति, वाद्य, सामाजिक भूमिका आ स्मृति-व्यवस्था अछि। किछुमे पूरा समुदाय भाग लैत अछि, दोसर किछु विशेष वंशानुगत अथवा पेशेवर कलाकार सँ बचल अछि।

बाहर बैसल पारम्परिक भारतीय लोक कलाकार जे धनुषसँ बजाएल जाएवाला तार वाद्य बजा रहल छथि
क्षेत्रीय आ सामुदायिक परम्परा संगीतकेँ अक्सर स्थान, प्रस्तुति, जीविका आ सामाजिक स्मृति सँ सीधा जोड़ैत अछि।
  • बंगालक बाउल परम्परा गीत, कविता, आध्यात्मिक चिन्तन आ एकतारा-दोतारा सन पोर्टेबल वाद्यकेँ एकसाथ अनैत अछि।
  • असममे बिहूसँ जुड़ल संगीत गीत, नृत्य आ वाद्यकेँ ऋतु-उत्सव, युवा जीवन आ कृषि सँ जोड़ैत अछि; व्यापक उत्तर-पूर्वमे अपन-अपन अनेक विशिष्ट सामुदायिक परम्परा सेहो अछि।
  • राजस्थान शक्तिशाली गायन आ वादन परम्पराक लेल प्रसिद्ध अछि; समुदाय आ वंशानुगत कलाकार धनुष-तार, तोड़ल जाएवाला तार, तालवाद्य आ वायु-वाद्यक संग रचनाभण्डार बचौने छथि।
  • उत्तर भारतक कजरी, चैती, सोहर, विवाह-गीत आ अन्य ऋतु वा जीवन-चक्र रूप संगीतकेँ बरखा, जन्म, विवाह, स्थानीय भाषा आ सामाजिक स्मृति सँ जोड़ैत अछि।
  • महाराष्ट्रक लावणी आ तमाशा, गुजरातक गरबा-संबन्धी संगीत, हिमालयी गीत-परम्परा, मध्य भारतक आदिवासी प्रस्तुति आ दक्षिण भारतक अनेक लोक-रूप देखबैत अछि जे संगीत नृत्य, नाटक आ सामुदायिक जुटान सँ कतेक नजदीक जुड़ल अछि।
  • भक्तिमूलक ध्वनि-जगतमे भजन, कीर्तन, अभंग, कव्वाली आ मन्दिर, दरगाह, सामूहिक उपासना, कविता आ तीर्थयात्रासँ जुड़ल अनेक क्षेत्रीय रूप अछि।

लोक, जनजातीय, भक्तिमूलक, क्षेत्रीय आ शास्त्रीय सन नाम दिशा देबाक लेल उपयोगी अछि, मुदा जीवंत परम्परा अक्सर एक-दोसरामे मिसल रहैत अछि। ऋतुक गीत भक्तिमूलक सेहो भऽ सकैत अछि; नाटकक रूपमे जटिल रचित संगीत रहि सकैत अछि; लोकवाद्य कन्सर्ट मंच पर आबि सकैत अछि; आ धुन सिनेमा वा लोकप्रिय संगीतमे जा सकैत अछि। केवल शैलीक नाम सँ बेसी महत्वपूर्ण अछि जे के बजबैत अछि, कतय सुनल जाइत अछि, कोन अवसर पर होइत अछि आ कोना अगिला पीढ़ी धरि पहुँचैत अछि।

भक्ति, नाटक आ नृत्य: पैघ प्रस्तुति-जगतक हिस्सा रूपेँ संगीत

भारतीय संगीत कविता, गति, कथा-कहानी आ पवित्र अभ्यासक संग बहुधा गहिर सम्बन्धमे रहैत अछि। मन्दिर परम्परा, सूफी दरगाह, सामूहिक गायन, शास्त्रीय नृत्य, लोकनाटक आ नाटकीय प्रस्तुति संगीतक अलग-अलग उपयोग करैत अछि। कतहु पाठ आ भक्तिक सन्देश मुख्य होइत अछि; कतहु ताल नृत्यकेँ सहारा दैत अछि, वाद्य-संकेत नाटकीय क्रियाकेँ आकार दैत अछि अथवा गायक मुख्य कथावाचक बनैत छथि। एहि परस्पर निर्भरताक कारण भारतीय संगीतक अध्ययन स्वाभाविक रूपेँ साहित्य, नृत्य, नाटक, अनुष्ठान आ क्षेत्रीय इतिहास धरि पहुँचैत अछि।

परम्परा सीखब: कान, स्मृति आ वंशधारा

मौखिक संचरण भारतीय संगीतक मूल आधार अछि। विद्यार्थी ध्यानसँ सुनैत अछि, अनुकरण करैत अछि, याद करैत अछि, दोहरबैत अछि आ धीरे-धीरे गुरु सँ वाक्य-विन्यास, स्वर-स्थान, रचनाभण्डार आ प्रस्तुति-विवेक आत्मसात करैत अछि। गुरु-शिष्य सम्बन्ध ऐतिहासिक रूपेँ शास्त्रीय आ अनेक पारम्परिक कलामे महत्वपूर्ण रहल अछि, यद्यपि आइ विश्वविद्यालय, अकादमी, संगीत विद्यालय, कार्यशाला, रिकॉर्डिंग, ऑनलाइन कक्षा आ डिजिटल अभिलेखागार सँ सेहो सीखल जाइत अछि। ई नव साधन पहुँच बढ़बैत अछि, मुदा ध्यानसँ सुनब आ निर्देशित सुधारक महत्व समाप्त नहि करैत अछि।

  • सुनब रागक वाक्यांश, अलंकरण, स्वर-गुण आ शैलीगत सूक्ष्मता चिन्हबाक क्षमता विकसित करैत अछि।
  • दोहराव रचना आ तालक ढाँचाकेँ केवल लिखित ज्ञान नहि रहए दैत, बल्कि शरीरमे बसल स्मृति बनबैत अछि।
  • गुरु विद्यार्थीकेँ ई भेद बुझबैत छथि जे तकनीकी रूपेँ की सम्भव अछि आ शैलीक हिसाबेँ की उचित अछि।
  • प्रस्तुतिक अनुभव संगतकार, दर्शक, नर्तक, सहगायक अथवा ताल-चक्र स्वयं सँ संवाद विकसित करैत अछि।
  • रिकॉर्डिंग आ अभिलेख कलाकार, क्षेत्र आ पीढ़ीक बीच तुलना सम्भव करैत अछि, तेँ ई जीवंत शिक्षाक मूल्यवान पूरक अछि।

कागज पर संगीत: स्वरलिपि आ ओकर सीमा

भारतीय संगीतमे ग्रन्थसभमे सुरक्षित संगीत-विचारक लम्बा इतिहास अछि। नाट्यशास्त्र, मातंगक बृहद्देशी आ बादक संगीतशास्त्रीय परम्परासँ जुड़ल कृति ध्वनि, पिच-व्यवस्था, सुरात्मक रचना, ताल आ संगीत-रचनापर विचार करैत अछि। रागक इतिहासमे बृहद्देशी विशेष महत्वपूर्ण अछि आ वर्तमान स्रोत एकरा राग तथा सा-रि-गा-मा स्वरलिपिक प्रारम्भिक रूपसँ जुड़ल ग्रन्थ बतबैत अछि। आधुनिक स्वरलिपि शिक्षण, संरक्षण आ तुलना आसान करैत अछि, मुदा ई पूरा संगीत-भूमि नहि—केवल ओकर नक्शा अछि।

स्वरलिपिक तरीकाउदाहरण रूपेँ आरोही क्रमई की देखबैत अछि
मूल हिन्दुस्तानी सरगमसा रे गा मा | पा धा नि सा’आपेक्षिक स्वर आ आसानीसँ याद रहएवाला रूपरेखा; व्यावहारिक प्रणालीमे विकृत स्वर, सप्तक, अवधि आ तालमे स्थान लेल चिन्ह जोड़ल जाइत अछि।
भातखण्डे स्वरलिपिसा रे गा मा | पा धा नि सा’स्वर, सप्तक आ तालमे स्थान लिखबाक व्यवस्थित तरीका, जे हिन्दुस्तानी शिक्षण आ प्रकाशित रचनाभण्डारमे बहुधा भेटैत अछि।
पलुस्कर स्वरलिपिसा रे गा मा | पा धा नि सा’हिन्दुस्तानी शिक्षणमे अवधि आ तालगत संगठन लेल अलग चिन्ह आ परम्पराक उपयोग।
कर्नाटक स्वर-स्वरलिपिसा रि गा मा | पा दा नि सा’रचना आ ताल-ढाँचाक भीतर स्वर देखबैत अछि; ई प्रणाली रि, गा, मा, दा आ निक पिच-भेद अलग करैत अछि।
पश्चिमी अक्षर-सन्दर्भसी डी ई एफ | जी ए बी सीजँ साकेँ अस्थायी रूपेँ सी मानल जाए तऽ ई केवल दिशा बुझबाक उपाय अछि; ई भारतीय स्वरस्थान, अलंकरण वा राग-व्याकरणकेँ पुनः प्रस्तुत नहि करैत अछि।

आधार स्वर सा चलायमान अछि, तेँ भारतीय स्वरलिपि कोनो एकटा अनिवार्य कन्सर्ट पिचसँ नहि बान्हल, बल्कि मूलतः आपेक्षिक अछि। लिखित चिन्ह गमक, मींड आ स्वरसभक बीचक अन्य निरन्तर गतियकेँ पूरा नहि पकड़ि सकैत अछि। तेँ एके मूल स्वरलिपि पढ़ियो परम्परा, गुरु, राग-व्याकरण आ प्रस्तुति-शैली अनुसार दू कलाकारक परिणाम बहुत अलग भऽ सकैत अछि। स्वरलिपिक सर्वोत्तम उपयोग सुनब आ स्मृतिकेँ सहारा देब अछि, ओकर जगह लेब नहि।

वाद्ययंत्र: ध्वनिक परिवार

भारतीय वाद्ययंत्रकेँ केवल क्षेत्र वा शैलीसँ नहि, बल्कि ध्वनि कोना बनैत अछि सेहो बुझल जा सकैत अछि। वर्तमान स्रोत तत, सुषिर, अवनद्ध आ घनक पारम्परिक चार भागक वर्गीकरण उपयोग करैत अछि। ई ढाँचा उपयोगी अछि, कारण ई कन्सर्ट वाद्य आ अनेक क्षेत्रीय वाद्यकेँ एके ध्वनिक तर्कक भीतर राखैत अछि।

पारम्परिक श्रेणीध्वनि कोना उत्पन्न होइत अछिउदाहरण
तत वाद्यतनल तारक कम्पन; तोड़ि वा धनुषसँ बजाओल जाइत अछिसितार, सरोद, वीणा, सारंगी, संतूर, तानपुरा
सुषिर वाद्यखोखला नलीक भीतर हवा कम्पित होइत अछिबाँसुरी, शहनाइ, नादस्वरम आ अनेक क्षेत्रीय बाँसुरी वा पाइप
अवनद्ध वाद्यतनल झिल्ली पर प्रहार कएल जाइत अछितबला, पखावज, मृदंगम, ढोलक, चेंडा आ अनेक क्षेत्रीय ढोल
घन वाद्यवाद्यक ठोस शरीर स्वयं कम्पित होइत अछिमंजीरा, करताल, घंटी आ प्रहार वा हिलासँ बजएवाला अन्य स्वयं-ध्वनि वाद्य
Late nineteenth-century sitar from a museum collection

प्रस्तुतिमे वाद्य कार्यगत भूमिका सेहो निभबैत अछि। तानपुरा आधार-नाद बनौने राखि सकैत अछि; तबला वा मृदंगम ताल-चक्रकेँ स्पष्ट करैत आ विकसित करैत अछि; सितार, सरोद, वीणा, वायलिन, बाँसुरी वा कण्ठ मुख्य सुर-रेखा लऽ सकैत अछि; आ सारंगी वा वायलिन गायकक संगत करैत रागक विकास पर रचनात्मक प्रतिक्रिया दे सकैत अछि। लोक आ भक्तिमूलक वातावरणमे पोर्टेबल ढोल, झाँझ, ल्यूट-जकाँ वाद्य, फिडल आ वायु-वाद्य संगीतकेँ जुलूस, नृत्य आ सामूहिक भागीदारी सँ सीधा जोड़ैत अछि।

ग्रामोफोन आ सिनेमा सँ स्ट्रीमिंग धरि: आधुनिक सुनबाक जगत

आधुनिक भारतीय संगीत पुरान परम्पराकेँ हटाकऽ नहि, बल्कि ओकर आधार पर बढ़ल अछि। रिकॉर्डिंग तकनीक, रेडियो, सिनेमा आ बादमे टेलिभिजन संगीतक प्रसार बदलि देलक, जाहिसँ आवाज आ शैली अपन मूल प्रस्तुति-स्थान सँ बहुत दूर धरि पहुँचि सकल। फिल्म संगीत विशेष रूपेँ प्रभावशाली बहुभाषिक क्षेत्र बनल, जतय शास्त्रीय राग, लोकधुन, भक्तिमूलक शैली, ऑर्केस्ट्रल लेखन, जैज, रॉक, इलेक्ट्रॉनिक निर्माण आ अन्तरराष्ट्रीय लोकप्रिय शैली एकसाथ भऽ सकैत अछि। सुगम-शास्त्रीय रूप, गजल, भजन, गैर-फिल्मी गीत आ क्षेत्रीय लोकप्रिय संगीत सेहो रिकॉर्डिंग आ प्रसारण सँ पैघ श्रोता-वर्ग बनौलक।

डिजिटल मंच एहि प्रसारकेँ फेर बढ़ौलक अछि। श्रोता किछु मिनटमे ध्रुपद प्रस्तुति सँ कर्नाटक कृति, बाउल गीत, क्षेत्रीय विवाह-संगीत, पुरान फिल्म रिकॉर्डिंग अथवा स्वतंत्र इलेक्ट्रॉनिक ट्रैक धरि जा सकैत छथि। ई सुविधा नवा खोजक मौका दैत अछि, मुदा सन्दर्भ आइयो जरूरी अछि। भाषा, अवसर, परम्परा, वाद्य, काव्यरूप आ प्रस्तुति-स्थल बुझला पर साधारण सुनब भारतक संगीत-विविधतासँ गहिर भेट बनि सकैत अछि।

सुनबाक एकटा व्यावहारिक राह

  1. एकटा क्षेत्रीय परम्परासँ शुरू करू आ भाषा, अवसर, वाद्य आ समुदायक बीच सम्बन्ध पर ध्यान दिअ।
  2. एकटा हिन्दुस्तानी आ एकटा कर्नाटक प्रस्तुति कात-कात सुनू। ध्यान दिअ जे दुनू कोना आधार स्वर स्थापित करैत अछि, सुर सामग्री विकसित करैत अछि आ तालसँ संवाद करैत अछि।
  3. एकटा वाद्य-परिवार चुनू आ तुलना करू जे अलग-अलग वाद्य स्थायित्व, प्रहारक आरम्भ, अनुनाद आ अलंकरण कोना उत्पन्न करैत अछि।
  4. सुनलाक बादे स्वरलिपिक तालिका पर घुरू। लिखित स्वर वास्तविक वाक्यांश आ गतिसँ जुड़ला पर बहुत स्पष्ट होइत अछि।
  5. एकटा भक्तिमूलक, लोक अथवा नाट्य परम्परा देखू आ पूछू—संगीत सामाजिक रूपेँ की कऽ रहल अछि: पूजा, नृत्य, कथा, काज, उत्सव वा सामूहिक स्मृतिकेँ संग दऽ रहल अछि?
  6. अन्तमे कोनो फिल्मी वा समकालीन ट्रैक सुनू आ चिन्हू जे कोन पुरान तत्व नवा रूपमे आयल अछि: रागक वाक्यांश, लोक-ताल, शास्त्रीय वाद्य, भक्तिपाठ अथवा क्षेत्रीय कण्ठ-रंग।
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